एमएसओ बिहार ने जवानों के मौजूदा फिकरी हालात पर किया वेबिनार

पटना: मुस्लिम स्टूडैंटस आर्गेनाईज़ेशन आफ़ इंडिया ऐम ऐस ओ बिहार के ज़ेर-ए-एहतिमाम “दौर-ए-हाज़िर में हम नौजवान और लम्हा फ़िक्रिया” के मौज़ू पर वेबिनार का इनइक़ाद किया गया। वेबिनार की शुरुआत हाफ़िज़ शमसे आलम ने क़ुरान पाक की तिलावत से किये। प्रोग्राम को मॉड्रेटरिंग एम एस ओ बिहार के सदर इंजीनियर नेहाल अहमद ग़ौसी कर रहे थे। इस मौके पर तहरीक उलमाये हिंद के चेयरमैन मुफ़्ती ख़ालिद अय्यूब मिस्बाही ने कहा कि दौर-ए-हाज़िर में उम्मते मुस्लिमा के लिए एक बहुत ही पेचीदा मसला इस उम्मत के नौजवान तबक़ा का है, किसी भी मुआशरे और सोसाइटी में इस वक़्त तक बेहतरी नहीं आ सकती है जब तक उस के नौजवान बेहतरी के लिए कमरबस्ता ना हो जाएं, मुआशरे के उमरदराज़ अफ़राद राय तो दे सकते हैं, सही राहनुमाई भी कर सकते हैं, सही ग़लत की निशानदेही कर सकते हैं, अच्छे बुरे की तमीज़ बतला सकते हैं लेकिन इन बूढ़े काँधों के सहारे मुआशरे या क़ौम की तक़दीर नहीं बदली जा है।

उन्होंने कहा कि किसी भी क़ौम की कामयाबी व नाकामी ,फ़तह वो शिकस्त और उरूज व ज़वाल में नौजवानों का अहम किरदार होता है । हर इन्क़िलाब चाहे वो सयासी हो या इक़तिसादी ,मुआशरती सतह का हो या मुल्की सतह का, साईंसी मैदान हो या इत्तलाआती मैदान, ग़रज़ सभी मैदानों में नौजवानों का किरदार निहायत ही अहम और कलीदी होता है।

उन्होंने कहा कि इस वक़्त उम्मत के नौजवानों में सबसे बड़ा अलमिया ये है कि वो तालीम से ना-बलद और दूरी इख़तियार किए हुए हैं।नौजवान तबक़ा उमूमन क़ुरआन-ए-मजीद को एक रस्मी और मज़हबी किताब समझता है। इस किताब के मुताल्लिक़ उनका तसव्वुर ये है कि इस के साथ अगर ताल्लुक़ क़ायम भी कर लिया जाये तो ज़्यादा से ज़्यादा तिलावत ही तक रहे। वो समझते हैं कि ये किताब ज़माना-ए-हाल के चैलेंजों का मुक़ाबला करने की अहलीयत और सलाहीयत नहीं रखती है ।हक़ीक़त ये है कि क़ुरआन-ए-मजीद किताब इन्क़िलाब है। ये अस्र-ए-हाज़िर के चैलेंजों का ना सिर्फ मुक़ाबला करने की अहलीयत रखती है बल्कि तमाम मसाइल का हल भी फ़राहम करती है। क़ुरआन जहां इन्सान को आफ़ाक़ की सैर कराता है वहीं ये हमें तमाम हकीकत से भी रोशनास कराता है । जहां इबादत के बारे में रहनुमाई करता है वहीं सियासी मुआमलात के लिए भी रहनुमा उसूल बयान करता है। जहां अख़लाक़ी तालीमात के बारे में हिदायात देता है वहीं ये इक़तिसादी निज़ाम के लिए भी ठोस बुनियादें फ़राहम करता है। ये जहां हलाल व हराम के दरमयान तमीज़ सिखाता है वहीं ये हक़-ओ-बातिल के दरमयान फ़र्क़ करने की सलाहीयत भी पैदा करता है।

आज उम्मत का नौजवान बेशुमार मसाइल और उलझनों में घिरा हुआ है । एक तरफ़ ग़ैर मुतवाज़िन निज़ाम तालीम के मसाइल का सामना कर रहा है तो दूसरी तरफ़ इक़तिसादी मसाइल से दो-चार है । एक तरफ़ अगर वक़्त पर निकाह ना होने के मसाइल हैं तो दूसरी तरफ़ बे रोज़गारी के मसाइल ने परेशानीयों में मुबतला कर रखा है। मसाइल और उलझनों का अंबार लगा हुआ है जिनसे उम्मत का ये अहम तबक़ा दो-चार है ।ये वाज़िह रहे कि नौजवान तबक़ा मसाइल का सामना करने से कतराता भी है । क्योंकि उनको इस सिलसिले में मतलूबा रहनुमाई नहीं मिल रही है ताकि वो इन मसाइल से बाआसानी नबर्द-आज़मा हो सके।

मिल्लत के इस तबक़े को इस्लाम के सरमाये इलम और तारीख़ से जोड़ना वक़्त की अहम तरीन पुकार है । इसी से कामयाबी मिल सिलती है। वेबिनार में एम एस ओ के कई अहम मेंबर्स भी मौजूद थे जैसे चेयरमैन डा. शुजात अली क़ादरी, क़ौमी सदर मोहम्मद मोदस्सीर, नाएब क़ौमी सदर अबू अशरफ वहीं बिहार के स्टेट कमेटी और डिस्ट्रिक्ट कमेटी के मेंबर्स भी मौजूद थे। आख़िर मे सवाल जवाब का दौर शुरू हुआ जिसमे कई अहम सवाल पूछे गए फिर प्रोग्राम का एख़्तादाम बिहार सदर ने सब का शुक्रिया करते हुए किये।

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